बरसात में पहाड़ की चुनौती: मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक के बाद पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता पर खास रिपोर्ट

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देहरादून/उत्तरकाशी, 30 जून/ उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में हर साल की तरह इस बार भी मानसून अपने साथ गंभीर चुनौतियाँ लेकर आया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रविवार को उत्तराखण्ड राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र में आयोजित समीक्षा बैठक में प्रदेश में हो रही भारी वर्षा की स्थिति का जायज़ा लिया। खासतौर पर उत्तरकाशी में बादल फटने की घटना के बाद राहत और बचाव कार्यों की समीक्षा करते हुए उन्होंने अधिकारियों को अलर्ट मोड पर रहने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने आगामी दो माह को मानसून की दृष्टि से अति संवेदनशील मानते हुए हर स्तर पर तत्परता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।

पहाड़ी भूगोल: आपदा के समय सबसे अधिक संवेदनशील

उत्तराखंड का अधिकतर हिस्सा पहाड़ी और विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाला है। हिमालय की तलहटी में बसे इन क्षेत्रों में नदियों, खड्डों और ऊंचे पर्वतों का जाल है। बरसात के दिनों में जब भारी वर्षा होती है, तो यही क्षेत्र सबसे अधिक आपदा की चपेट में आते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यहां की मिट्टी अधिकतर ढीली होती है, जिस कारण भारी वर्षा के दौरान भूस्खलन की घटनाएं आम हैं। वहीं तेज़ बारिश के साथ नदियों के जलस्तर में अचानक वृद्धि और बादल फटने जैसी घटनाएं लोगों के जीवन को सीधे प्रभावित करती हैं।

उत्तरकाशी में बादल फटने की घटना—

हाल ही में उत्तरकाशी जिले में बादल फटने की एक घटना ने स्थानीय प्रशासन की नींद उड़ा दी। कई ग्रामीण क्षेत्रों में रास्ते बंद हो गए, पानी के बहाव से घरों और खेतों को नुकसान पहुंचा। मुख्यमंत्री ने स्वयं इस स्थिति की समीक्षा करते हुए राहत-बचाव कार्यों को तेज़ करने के निर्देश दिए हैं।

चारधाम यात्रा पर असर—

मुख्यमंत्री धामी ने चारधाम यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए अगले 24 घंटे के लिए यात्रा को अस्थायी रूप से रोके जाने के निर्देश दिए। उन्होंने संबंधित जिलाधिकारियों को यात्रियों के ठहराव, भोजन, दवा, बच्चों के लिए दूध जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की व्यवस्था करने के भी निर्देश दिए। हेली एम्बुलेंस और SDRF की तैनाती को और सुदृढ़ किया गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति से त्वरित निपटा जा सके।

बरसात के दौरान प्रमुख समस्याएं—

  1. भूस्खलन: बरसात के दौरान अक्सर सड़कों पर मलबा आ जाने से यातायात बाधित होता है। यह स्कूली बच्चों, आपात मरीजों और स्थानीय यात्रियों के लिए बड़ा संकट बन जाता है।

  2. नदी-नालों में उफान: तेज बारिश के कारण छोटे-छोटे गदेरों में बाढ़ आ जाती है, जिससे पुलिया टूटने, सड़क कटने और बस्तियों में पानी भरने की घटनाएं बढ़ जाती हैं।

  3. संचार बाधित: पहाड़ी क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क और बिजली आपूर्ति पहले से ही सीमित होती है। भारी बारिश में ये सुविधाएं पूरी तरह ठप हो जाती हैं, जिससे राहत कार्य भी प्रभावित होते हैं।

  4. ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य संकट: सड़कें बंद होने से गांवों में बीमारों को समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती, जिससे जनहानि की संभावना बनी रहती है।

मुख्यमंत्री का संदेश—

सीएम धामी ने कहा, “राज्य सरकार लगातार स्थिति पर नज़र बनाए हुए है। हम हर नागरिक की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। आपदा की घड़ी में सरकारी तंत्र पूरी तरह सतर्क है और नागरिकों से भी अपील है कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें।”

उत्तराखंड की पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियां मानसून के समय बड़ी चुनौती बन जाती हैं। ऐसे में केवल सरकारी तैयारियों से नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की जागरूकता और संयम से भी आपदा का प्रभाव कम किया जा सकता है। यह समय है जब ‘प्राकृतिक आपदा प्रबंधन’ केवल एक सरकारी शब्द नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का हिस्सा बनना चाहिए।

डिस्क्लेमर:
(यह समाचार रिपोर्ट सरकारी व स्थानीय प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराई गई सत्यापित जानकारी पर आधारित है। इसमें प्रस्तुत सभी तथ्य प्रमाणित स्रोतों से लिए गए हैं और रिपोर्टिंग के समय तक की ताज़ा जानकारी को शामिल किया गया है। The Mountain Stories पत्रकारिता की आचार संहिता एवं विधिक मानकों का पूर्ण रूप से पालन करता है)


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