पंचायती पर्व ! घर आ जा परदेशी तेरा गावं बुलाये रे,,,,

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ओम जोशी -देहरादून

पूरे देश में तीज त्योहारों को विशेष तवज्जो दी जाती है। वैसे ही प्रत्येक पांच वर्ष बाद आने वाले ग्राम पंचायत चुनाव भी हमें एक पर्व समान ही महसूस होते है, हमारी ग्रामीण पृष्ट्भूमि और चुनावी मूड दोनों ही बाते हमें इसके लिए उत्साहित करती हैं। जिस कारण ये चुनाव एक त्यौहार का रूप लेता है और इसको अनोखे अंदाज में अंजाम दिया जाता है।  इस वक़्त में सभी ग्राम वासियों के साथ साथ  अपने घरों से विमुख दिल्ली,मुंबई और चंडीगढ़ में अपना जीवन यापन करते लोग भी उत्साहित नजर आते हैं और अपने अपने स्तर से गावं के प्रति अपना प्यार उमड़ते दिखाई देते हैं।

कुछ वर्षों से इसमें ज्यादा प्रगति हुई जबसे सोशल मीडिया जैसे प्लेटफार्म प्रत्येक व्यक्ति उपयोग करने लगा। लोग अपने प्रिय-जानो की खोज खबर में लग जाते हैं और नयी रणनीतियां बनती दिखाई देती है। कई तरह की रिश्तेदारियां नातेदारियाँ बनती बिगड़ती है, भाईचारा बनने बिगड़ने का खेल शुरू हो जाता है, और अपनी अपनी जात बिरादियाँ एकतित्र होकर अपनी ताकत दिखाती हैं।
इस पर्व के कई उजले पक्षों में एक उजला पक्ष यह है की कई नयी पहल जन्म लेती दिखाई देती हैं। गौर तलब है की इस पहल में भाजपा नेता अनिल बलूनी जी द्वारा ‘अपना वोट अपने गावं’ जैसी भावनात्मक अपील विशेष रूप से सरहानीय प्रयास है, जिसमे वे कोटद्वार क्षेत्र से अपने पैतृक गावं की ओर  रुखसत हुए और उनके द्वारा भारतीय थलसेना प्रमुख विपिन रावत और राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को भी इस मुहीम के लिए आह्वान एक सुखद अनुभूति देता है।
आज स्थिति यह है की पहले पहाड़ नेता विहीन हुए धीरे धीरे फिर जनता विहीन भी हो गए । पलायन के आंकड़े हमें डराते हैं यह अब भयानक रूप ले चूका है। कई गावं घोस्ट विलेज घोषित हो गए हैं। लोग अपने घरों में वापसी को बिलकुल तैयार नहीं, वे इसे एक पर्व की तरह मनाएंगे और फिर वापस दूर-देश चले जायेंगे। उधर सरकार अपने आंकड़ों से खेलकर रिवर्स पलायन का दृश्य दिखाती नजर आएगी।
निर्वाचन आयोग मुस्तैद हो चूका और आयोग की हरकत भी शुरू हो चुकी है अभी इस पर्व का असली रंग तब नजर आने लगेगा जब इसमें राजनैतिक दल अपनी पूर्ण भूमिका में दाखिल होंगे और फिर अफवाहों और बयानबाजी का दौर शुरू होगा व गलत बयानी कर इसे  इसे बदरंग बनाने की कोशिश की जाएगी । उम्मीद करेंगे की मतदाता कठपुतली न बन समझदारी से इस पर्व को मनाये।
अच्छा हो अगर सरकार इस बेशकीमती वक्त का विशुद्ध उपयोग कर गावं समाज से जुड़े लोगों तक पहुंचे और पलायन सम्बंधित समस्या के कारणों और निवारणों पर विचार करे जिससे की इस पर्व की महत्त्वता बने ऐसा न हो एक दिन चुनाव आयोग पहाड़ों की और रुख न करने पर मजबूर हो जाए।

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