महाशिवरात्रि 2026: दुर्लभ ग्रह योग, भद्रा का संयोग और चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व
देहरादून/नई दिल्ली। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर मनाया जाने वाला महाशिवरात्रि का पर्व इस वर्ष 15 फरवरी को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, इस बार महाशिवरात्रि पर कई दुर्लभ और शुभ योग एक साथ बन रहे हैं, जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ गया है।

दुर्लभ ग्रह योगों का संयोग
पंचांग गणनाओं के मुताबिक इस वर्ष कुंभ राशि में बुधादित्य, शुक्रादित्य, लक्ष्मी नारायण और चतुर्ग्रही योग का संयोग बन रहा है। इसके साथ ही सर्वार्थ सिद्धि, प्रीति, ध्रुव और व्यतिपात जैसे शुभ योग भी रहेंगे। ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि ऐसे संयोग विरले ही बनते हैं और साधना-उपासना के लिए अत्यंत फलदायी माने जाते हैं।
तिथि और व्रत का समय
चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी को शाम 5:04 बजे से प्रारंभ होकर 16 फरवरी को शाम 5:34 बजे तक रहेगी। चतुर्दशी तिथि का प्रभाव रात्रि में होने के कारण महाशिवरात्रि व्रत और रात्रि पूजन 15 फरवरी को ही किया जाएगा।
भद्रा योग को लेकर स्थिति स्पष्ट
इस वर्ष महाशिवरात्रि के दिन भद्रा योग भी बन रहा है, जो 15 फरवरी शाम 5:04 बजे से 16 फरवरी सुबह लगभग 5:23 बजे तक प्रभावी रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भद्रा का वास पाताल लोक में होता है तो उसका प्रतिकूल प्रभाव पृथ्वी लोक पर नहीं पड़ता। इस कारण शिव पूजा, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक में किसी प्रकार की बाधा नहीं मानी जा रही है।

चार प्रहर पूजा का महत्व
महाशिवरात्रि की रात्रि को चार प्रहरों में विभाजित कर पूजा का विधान है:
-
प्रथम प्रहर: 15 फरवरी, शाम 6:11 बजे से रात 9:22 बजे तक
-
द्वितीय प्रहर: 15 फरवरी, रात 9:23 बजे से 16 फरवरी, रात 12:34 बजे तक
-
तृतीय प्रहर: 16 फरवरी, रात 12:35 बजे से सुबह 3:46 बजे तक
-
चतुर्थ प्रहर: 16 फरवरी, सुबह 3:46 बजे से सुबह 6:59 बजे तक
निशीथ काल पूजा: 16 फरवरी, रात 12:09 बजे से 1:01 बजे तक — इसे अत्यंत शुभ माना गया है।

दिन के शुभ मुहूर्त
महाशिवरात्रि के दिन जलाभिषेक के लिए कई शुभ मुहूर्त प्राप्त हो रहे हैं:
-
सुबह 8:24 बजे से 9:48 बजे तक
-
सुबह 9:48 बजे से 11:11 बजे तक
-
अमृत मुहूर्त: सुबह 11:11 बजे से 12:35 बजे तक
-
सायंकाल 6:11 बजे से 7:47 बजे तक
शिव पूजा के तीन स्वरूप
धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव की पूजा को सात्विक, राजसिक और तामसिक रूप में वर्णित किया गया है।
-
सात्विक पूजा: दूध, दही, घी, शहद, बेलपत्र, पुष्प और फल अर्पित कर की जाती है।
-
राजसिक पूजा: भांग, धतूरा, रुद्राक्ष, कमल पुष्प आदि से की जाती है।
-
तामसिक या अघोर साधना: भस्म श्रृंगार और विशेष साधना विधि के माध्यम से की जाती है।
मान्यता है कि भक्त जिस भाव से शिव की आराधना करता है, उसी अनुरूप उसे फल प्राप्त होता है।

विशेष उपाय और अभिषेक
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार—
-
पाँच बिल्वपत्रों पर “राम” लिखकर अर्पित करने से धन संबंधी कष्टों में राहत मिलती है।
-
तीन पत्तों पर केसर या चंदन से “ॐ नमः शिवाय” लिखकर अर्पित करने से पद-प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है।
अभिषेक के लिए भी विभिन्न पदार्थों का विशेष महत्व बताया गया है:
-
दूध — मानसिक शांति के लिए
-
गन्ने का रस — धन लाभ के लिए
-
सरसों का तेल — शत्रु बाधा निवारण हेतु
-
गिलोय का रस — आरोग्य के लिए
-
गंगाजल — शिव भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए
पूजन विधि
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की शुद्धि के बाद दीप प्रज्वलित कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठें। तांबे या मिट्टी के पात्र में स्वच्छ जल लेकर उसमें गंगाजल या दूध मिलाकर “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करते हुए शिवलिंग पर अर्पित करें। इसके बाद बेलपत्र, धतूरा, भस्म और फल अर्पित कर मंगलकामना करें।
महाशिवरात्रि केवल व्रत और पूजन का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, साधना और जागरण का आध्यात्मिक अवसर है। श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई आराधना को जीवन के कष्टों से मुक्ति और मनोकामना सिद्धि का माध्यम माना गया है।
