विधानसभा सचिवालय से बर्खास्त कर्मचारियों के मामले में हाईकोर्ट की सुनवाई, प्रार्थना पत्र निरस्त; 15 अक्टूबर को अगली सुनवाई
नैनीताल। उत्तराखंड विधानसभा सचिवालय से बर्खास्त किए गए कर्मचारियों के मामले में गुरुवार को नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की एकलपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान बर्खास्त कर्मचारियों की ओर से प्रार्थना पत्र दाखिल कर वर्ष 2016 से पहले नियुक्त कर्मचारियों की नियुक्ति से संबंधित दस्तावेज कोर्ट में पेश करने की अनुमति मांगी गई। कोर्ट ने इस प्रार्थना पत्र को निरस्त कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने निर्देश दिया कि वर्ष 2016 से पहले नियुक्त कर्मचारियों से संबंधित दस्तावेज शपथपत्र के माध्यम से कोर्ट में पेश किए जाएं। इसके बाद विधानसभा सचिवालय को इन दस्तावेजों पर अपनी आपत्ति दाखिल करने को कहा गया। मामले की अगली सुनवाई अब 15 अक्टूबर को होगी।
नियुक्तियां वैध होने का याचिकाकर्ताओं का दावा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि उनकी नियुक्तियां वैध हैं। उनका कहना था कि विधानसभा अध्यक्ष को कर्मचारियों की नियुक्ति करने का अधिकार प्राप्त है। याचिकाकर्ताओं ने अपनी सेवाएं समाप्त किए जाने के तरीके पर भी सवाल उठाए।
वहीं, विधानसभा सचिवालय की ओर से कहा गया कि जिन नियुक्तियों को अवैध पाया गया, उन्हें नियमों के तहत समाप्त किया गया है। सचिवालय का पक्ष था कि संबंधित नियुक्तियां नियमावली को ध्यान में रखे बिना की गई थीं और विधानसभा अध्यक्ष को इस तरह नियुक्तियां करने का अधिकार नहीं था। सचिवालय की ओर से यह भी कहा गया कि बिना विज्ञप्ति जारी किए 228 कर्मचारियों को सचिवालय में नियुक्ति दी गई थी।
225 से अधिक कर्मचारियों ने दी है बर्खास्तगी को चुनौती
दरअसल, बबिता भंडारी, कुलदीप सिंह, भूपेंद्र सिंह बिष्ट समेत 225 अन्य कर्मचारियों ने अपनी बर्खास्तगी के आदेश को नैनीताल हाईकोर्ट की एकलपीठ में चुनौती दी है।
याचिकाओं में कहा गया है कि विधानसभा अध्यक्ष की ओर से लोकहित का हवाला देते हुए 27, 28 और 29 सितंबर 2022 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि बर्खास्तगी आदेश में उन्हें हटाने के स्पष्ट आधार और कारण का उल्लेख नहीं किया गया। साथ ही उनका पक्ष भी नहीं सुना गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने सचिवालय में नियमित कर्मचारियों की तरह काम किया है। ऐसे में एक साथ इतने कर्मचारियों को सेवा से हटाना लोकहित में नहीं माना जा सकता और बर्खास्तगी का आदेश विधि के अनुरूप नहीं है।
2001 से 2015 के बीच हुई नियुक्तियों का भी दिया हवाला
याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिकाओं में दावा किया है कि उत्तराखंड विधानसभा सचिवालय में वर्ष 2001 से 2015 के बीच 396 पदों पर बैकडोर नियुक्तियां की गई थीं, जिन्हें बाद में नियमित भी किया जा चुका है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वर्ष 2014 तक नियुक्त किए गए तदर्थ कर्मचारियों को चार वर्ष से कम की सेवा के बाद नियमित नियुक्ति दे दी गई, जबकि उन्हें छह वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद भी नियमित नहीं किया गया।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्हें नियमित करने के बजाय सेवा से हटा दिया गया। उनका यह भी कहना है कि उनकी नियुक्तियों को वर्ष 2018 में जनहित याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई थी। उस मामले में कोर्ट ने उनके पक्ष में आदेश दिया था और उनकी नियुक्तियों को वैध माना था। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि नियमानुसार छह महीने की नियमित सेवा के बाद उन्हें नियमित किया जाना था।
अब हाईकोर्ट के निर्देश के बाद वर्ष 2016 से पहले नियुक्त कर्मचारियों से संबंधित दस्तावेज शपथपत्र के माध्यम से रिकॉर्ड पर रखे जाएंगे। विधानसभा सचिवालय इन दस्तावेजों पर अपनी आपत्ति दाखिल करेगा। मामले में अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी।
