बाराहोती:- एक सुखद अविस्मरणीय अनुभव, प्राकृतिक सुंदरता-समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक शांति का अनुभव

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उत्तराखंड के चमोली जिले में लगभग 15,550 फिट की ऊँचाई पर स्थित एक सुंदर और पवित्र स्थल बाराहोती,  हिमालय की गोद में स्थित यह स्थान एक सुंदर और पवित्र स्थल है जो धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इसके नयनाभिराम दृश्य अवश्य ही आपके मन को मोह लेंगे। सुंदरता में ही नहीं बल्कि यह एक नेक पवित्र स्थल भी है जो धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। दूर-दूर तक फैले चरागाह और इनसे घिरे इस स्थान के महत्वपूर्ण होने का बड़ा कारण इसकी प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक स्थल, पौराणिक मान्यताएं और यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है।

आइये देखते हैं कुछ मनोहारी चित्र और अनुभव लेते हैं कि, क्या है बाराहोती की प्राकृतिक सुंदरता और क्यूँ बाराहोती यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को  कैसे करती है मंत्रमुग्ध—–

    चित्र साभार – पवन नेगी 

(यहाँ की सुन्दर पर्वत श्रृंखलाएं, हरियाली व स्वच्छ जलवायु लोगों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव देती हैं )

देवभूमि कहे जाने वाले राज्य उत्तराखंड में स्थित इस बाराहोती क्षेत्र में विभिन्न स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा की जाती है तथा इन देवी-देवताओं को यहाँ की भूमि और लोगों का रक्षक माना जाता है। इनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्रद्धालु लम्बे समय से उनकी पूजा करते आ रहे हैं। इस क्षेत्र का प्राचीन काल से ही धार्मिक मान्यताओं, लोक कथाओं और किंवदंतियों का समृद्ध इतिहास रहा है। जहां इस जगह से जुड़ी विभिन्न दैवीय घटनाओं और आशीर्वादों की कहानियां यहाँ परम आध्यात्मिक सुख की अनुभूति कराती हैं वहीं इस क्षेत्र में स्थित प्राकृतिक झरनों, पर्वतों और नदियों को पवित्र माना जाता है तथा वे यहाँ की स्थानीय पारंपरिक प्रथाओं के महत्वपूर्ण हिस्सा भी है।

चित्र साभार – पवन नेगी 

(पांडवों के अस्तित्व और उनकी साधना के आध्यात्मिक चिन्ह आज भी यहाँ पाए जाते हैं)

कहा जाता है कि महाभारत काल में पांडवों ने बाराहोती के आस-पास स्थित क्षेत्रों में तपस्या और साधना की थी। यहाँ के कई स्थानों पर पांडवों के अस्तित्व और उनकी साधना के आध्यात्मिक चिन्ह आज भी पाए जाते हैं। लोक कथाओं और किंवदंतियों के अनुसार मान्यता है कि बाराहोती क्षेत्र में भगवान शिव और माता पार्वती ने तपस्या की थी तथा यहाँ निवास किया था। इसीलिए यह स्थान भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहाँ माता पार्वती के नाम से बने पार्वती कुंड का भी विशेष धार्मिक महत्व है और इस कुंड का जल पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इसमें स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है। पार्वती कुंड यात्रा के दौरान श्रद्धालु सुंदर प्राकृतिक दृश्यों का भी आनंद लेते है और यहाँ के मनोरम परिवेश में आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं।

चित्र साभार – पवन नेगी 

(यह भूमि नागों की आराधना के लिए भी पवित्र मानी जाती है)

बाराहोती मलारी और नीति गांव के क्षेत्र में नागों की पौराणिक कथाएं विशेष रूप से प्रचलित है। माना जाता है कि यहाँ नाग देवताओं का वास है इसलिए यह भूमि नागों की आराधना के लिए पवित्र मानी जाती है। यहाँ नाग पंचमी के अवसर पर यहाँ विशेष पूजा-अर्चना की जाती है तथा आसपास के क्षेत्रों में कई धार्मिक त्योहार और पूजा का आयोजन किया जाता है।  मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन नाग देवताओं की पूजा करने से कष्टों का निवारण होता है। लोग, नाग देवताओं की पूजा करते हैं तथा उन्हें दूध, फूल और चावल अर्पित करते हैं। स्थानीय लोग पर्वों और त्योहार यहां हर वर्ष मई से अक्टूबर माह के बीच मनाते आ रहे हैं।

चित्र साभार – पवन नेगी 

(सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है यह पार्वती कुंड)

बराहोती का महत्व केवल यहाँ के धार्मिक स्थलों और पौराणिक कथाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ आने वाले लोगों को मिलने वाला आध्यात्मिक सुख और आत्मा की शांति इसे ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती है। यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता, शांत वातावरण और रमणीय स्थलों का आभास होना ही लोगों को आत्मिक शांति और ख़ुशी प्रदान करता है। यहाँ वहां बिखरे प्राकृतिक सौंदर्य और यहाँ का स्थानीय परिवेश धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देते हैं वहीँ यहाँ हर साल जो श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं इससे यहाँ के स्थानीय लोगों और अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय प्रशासन और भारतीय सेना ने यहाँ कई प्रकार कि योजनायें शुरू की है।

चित्र साभार – पवन नेगी 

(यहाँ हर वर्ष श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं)

बाराहोती तक पहुँचने के लिए जोशीमठ से मलारी की दूरी लगभग 61 किलोमीटर और मलारी से बाराहोती तक की दूरी लगभग 44 किलोमीटर है। श्रद्धालुओं की यात्रा को सुगम और सुचारू करने हेतु इस इलाके के मलारी, कोसा, घमशाली, बम्पा, कैलाशपुर, फरकिया और नीति गाँव में अतिथिगृह/ होम स्टे मौजूद हैं जहाँ पर आप स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का अनुभव कर सकते हैं। इस पवित्र जगह की यात्रा करने हेतु श्रद्धालुओं को सिविल जिला प्रशासन से इनर लाइन परमिट(ILP) लेने की जरूरत पडती है, जिसमें लगभग 15 से 20 दिन का समय लग जाता है। यह अनुमति उप जिला अधिकारी के द्वारा दी जाती है। इनर लाइन परमिट के लिए आधार कार्ड, पहचान पत्र और वाहनों का पंजीकरण प्रमाण पत्र आदि दस्तावेजों की जरूरत पडती है। साथ ही हर श्रद्धालु के पास शारीरिक रूप से स्वस्थ होने का मेडिकल फिटनेस प्रमाणपत्र होना भी अनिवार्य है।
निश्चय ही बाराहोती की यात्रा आपको जीवन का एक सुखद अविस्मरणीय अनुभव देगी, बल्कि इसके पर्वतीय, प्राकृतिक सौन्दर्य आपको ताजगी और आत्मचिंतन का मौका भी देंगे।

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