मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण, उत्तरायणी और गुड़-तिल पर्वों का शुभारंभ, पुण्य स्नान 15 जनवरी को भी, अब छह मास के लिए उत्तरायण हो जाएंगे सूर्य

Our News, Your Views

मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण, उत्तरायणी और गुड़-तिल पर्वों का शुभारंभ, पुण्य स्नान 15 जनवरी को भी, अब छह मास के लिए उत्तरायण हो जाएंगे सूर्य

देहरादून / सूर्यदेव की छह माह लंबी दक्षिणायन यात्रा अब समाप्ति की ओर है। मकर संक्रांति के साथ ही 14 जनवरी से सूर्य उत्तरायण होंगे, जिससे उत्तरायणी पर्वों की शुरुआत, गुड़–तिल के त्योहारों का आगाज़ और मांगलिक कार्यों पर लगे विराम का अंत हो जाएगा। इसी के साथ हेमंत ऋतु विदा लेगी और शिशिर ऋतु का आगमन होगा।

मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक पर्वकाल रहेगा। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार बुधवार को माघ कृष्ण एकादशी के दिन सूर्यनारायण अनुराधा नक्षत्र में धनु राशि छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। धार्मिक विश्वास है कि सूर्य के मकरस्थ होते ही तिल–गुड़ के पर्व प्रारंभ हो जाते हैं और जाड़ा धीरे–धीरे कम होने लगता है।

माघ मास के लगते ही विवाह सहित अन्य शुभ कार्यों पर लगा प्रतिबंध समाप्त हो जाएगा। इस अवधि में लोहड़ी, सकट चौथ, षट्तिला एकादशी, वसंत पंचमी और मौनी अमावस्या जैसे प्रमुख पर्व मनाए जाएंगे। उत्तरायण के साथ सूर्य दक्षिण–पूर्व दिशा से उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू करते हैं, हालांकि कड़ाके की ठंड का 40 दिनों का ‘चिल्ला’ 8 फरवरी तक जारी रहेगा।

देश के विभिन्न हिस्सों में मकर संक्रांति अलग–अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है। उत्तर भारत के गांगेय क्षेत्रों में स्नान पर्वों की शुरुआत होती है, जबकि पर्वतीय राज्यों में उत्तरायणी मेलों का आयोजन किया जाता है। पंजाब में लोहड़ी, असम में बिहू और दक्षिण भारत में फसल पर्वों की परंपरा इस अवसर से जुड़ी है। संक्रांति पर उड़द दाल और चावल की खिचड़ी बनाकर दान करने की परंपरा भी प्रचलित है।

धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति को देवताओं का प्रभात काल माना गया है, जो लगभग मध्य जुलाई तक रहता है। मान्यता है कि इसी उत्तरायणी काल की प्रतीक्षा महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपने महाप्रयाण के लिए की थी।


Our News, Your Views