उत्तराखंड ने खो दिया अपना “जनरल साहब” नहीं रहे पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी

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उत्तराखंड ने खो दिया अपना “जनरल साहब”, नहीं रहे पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी

देहरादून/हरिद्वार। उत्तराखंड की राजनीति, प्रशासनिक ईमानदारी और सैनिक अनुशासन की एक सशक्त पहचान माने जाने वाले Bhuvan Chandra Khanduri अब इस दुनिया में नहीं रहे। 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे और देहरादून के मैक्स अस्पताल में भर्ती थे। उनके निधन की खबर सामने आते ही पूरे उत्तराखंड में शोक की लहर दौड़ गई। देहरादून स्थित उनके आवास पर नेताओं, सैन्य अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम लोगों का लगातार पहुंचना जारी है।

उत्तराखंड ने केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री नहीं खोया, बल्कि एक ऐसा व्यक्तित्व खो दिया जिसने सैनिक जीवन से लेकर लोकतांत्रिक राजनीति तक हर भूमिका में अनुशासन, सादगी और राष्ट्रसेवा को सर्वोपरि रखा।

उनकी बेटी और उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष Ritu Khanduri Bhushan ने पिता के निधन पर बेहद भावुक शब्दों में कहा—
“आज शब्द साथ नहीं दे रहे हैं। मैंने केवल अपने पिता को नहीं खोया, बल्कि अपने जीवन के सबसे बड़े संबल, मार्गदर्शक और उस व्यक्तित्व को विदा किया है जिसकी छाया में मैंने कर्तव्य, अनुशासन और सेवा का अर्थ समझा।”

उन्होंने कहा कि उनके पिता का जीवन किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण की जीवंत गाथा था।

रणभूमि से राजनीति तक का सफर

1 अक्टूबर 1934 को जन्मे भुवन चंद्र खंडूड़ी ने 1954 में भारतीय सेना की कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स में कमीशन प्राप्त किया। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध में देश की सेवा की। सीमाओं पर उनका जीवन केवल एक सैनिक का साहस नहीं था, बल्कि उस परिवार की भी कहानी था जिसने वर्षों तक प्रतीक्षा, चिंता और त्याग का मौन संघर्ष जिया।

करीब 36 वर्षों की गौरवपूर्ण सैन्य सेवा के दौरान उन्होंने नेतृत्व और कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी मिसाल कायम की कि उन्हें 1982 में “अति विशिष्ट सेवा मेडल” से सम्मानित किया गया। सेना से मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने विश्राम नहीं चुना, बल्कि जनसेवा का नया अध्याय शुरू किया।

अटल बिहारी वाजपेयी के भरोसेमंद सहयोगी

राजनीति में उनका प्रवेश पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee के विश्वास के साथ हुआ। 1990 के दशक में भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी जिम्मेदारी दी। गढ़वाल की जनता ने उन्हें बार-बार संसद भेजा।

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री के रूप में उन्होंने भारत की सड़क व्यवस्था को नई दिशा दी। राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना और गोल्डन क्वाड्रिलेटरल जैसी ऐतिहासिक योजनाओं को गति देने में उनकी भूमिका आज भी याद की जाती है। कहा जाता है कि वाजपेयी को उनकी कार्यशैली पर इतना भरोसा था कि उन्हें निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता मिली हुई थी।

उत्तराखंड में “ईमानदार शासन” की पहचान

उत्तराखंड के चौथे मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल सादगी, पारदर्शिता और सुशासन का प्रतीक माना जाता है। वे दो बार राज्य के मुख्यमंत्री बने।

2007 में जब उत्तराखंड भाजपा के भीतर गुटबाजी चरम पर थी, तब पार्टी नेतृत्व ने राज्य की कमान खंडूड़ी को सौंपी। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने मजबूत लोकायुक्त कानून, प्रशासनिक सुधार और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रवैये के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई।

उनकी कार्यशैली कठोर जरूर मानी जाती थी, लेकिन उस कठोरता के पीछे राज्य के लिए ईमानदार सोच थी। यही वजह थी कि आम जनता उन्हें “जनरल साहब” कहकर सम्मान देती थी।

बेटी की आंखों से एक पिता

ऋतु खंडूड़ी के शब्दों में पिता केवल राजनेता नहीं थे। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपने परिवार को भी राष्ट्रसेवा का अर्थ समझाया। उन्होंने कहा कि बचपन के कई पल ऐसे थे जब पिता केवल पत्रों में मौजूद होते थे, लेकिन उन्होंने कभी शिकायत करना नहीं सिखाया—सिर्फ गर्व करना सिखाया।

उनके बेटे Manish Khanduri ने भी सोशल मीडिया पर लिखा—
“बहुत दुख के साथ सूचित कर रहा हूं कि अभी-अभी मेरे पिताजी नहीं रहे। वह मेरे सब कुछ थे—मेरे पिता, मेरे भगवान।”

राष्ट्र नेतृत्व ने दी श्रद्धांजलि

राष्ट्रपति Droupadi Murmu, प्रधानमंत्री Narendra Modi, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami सहित कई राष्ट्रीय नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि खंडूड़ी ने सशस्त्र बलों से लेकर राजनीति तक हर क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया और देशभर में कनेक्टिविटी सुधारने के लिए उनके प्रयास सदैव याद रखे जाएंगे।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उन्हें राष्ट्रसेवा, अनुशासन, सादगी और ईमानदार राजनीति का प्रतीक बताया।

अंतिम यात्रा कल

जानकारी के अनुसार उनका पार्थिव शरीर देहरादून स्थित आवास पर अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। 20 मई को हरिद्वार में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। सुबह 10 बजे उनकी अंतिम यात्रा निकाली जाएगी।

उत्तराखंड की राजनीति में कई चेहरे आए और गए, लेकिन कुछ नाम केवल पदों से नहीं, अपने चरित्र से याद किए जाते हैं। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी उन्हीं दुर्लभ व्यक्तित्वों में से एक थे।

उन्होंने वर्दी में सीमा की रक्षा की, राजनीति में व्यवस्था सुधारने की कोशिश की और जीवन भर ईमानदारी को अपना सबसे बड़ा परिचय बनाए रखा।

आज उत्तराखंड केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री को विदाई नहीं दे रहा, बल्कि अपने उस “जनरल साहब” को अंतिम सलाम कर रहा है, जिसकी पहचान सत्ता नहीं, सादगी थी।


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