उत्तराखंड में SIR पर घमासान: 1.07 लाख नामों पर आपत्तियां, विधायक से दिवंगत तक के नाम पर उठे सवाल
देहरादून: उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR-2026 की प्रक्रिया अब सिर्फ नामों की जांच तक सीमित नहीं रह गई है। दावे और आपत्तियों के बीच मामला राजनीतिक बहस का विषय बनता जा रहा है। प्रदेश कांग्रेस ने जहां बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज किए जाने के तरीके पर सवाल उठाए हैं, वहीं निर्वाचन विभाग ने भी प्रक्रिया की निगरानी के लिए तीन जिलों में नौ प्रशासनिक अधिकारियों को मैदान में उतार दिया है।
मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि राज्य में 1.07 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम पर आपत्तियां दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इनमें हरिद्वार की पिरान कलियर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक फुरकान अहमद का नाम भी शामिल है।
यही नहीं, कांग्रेस ने ऊधमसिंह नगर के गदरपुर में एक दिवंगत महिला और न्यायिक हिरासत में बंद लोगों के नाम से दर्ज आपत्तियों की भी जांच की मांग की है।
कांग्रेस ने उठाए आपत्तियों की प्रक्रिया पर सवाल
प्रदेश कांग्रेस महासचिव संगठन राजेंद्र सिंह भंडारी के नेतृत्व में पार्टी प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बीवीआरसी पुरुषोत्तम से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा।
कांग्रेस का आरोप है कि कई विधानसभा क्षेत्रों में एक ही व्यक्ति के माध्यम से बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज की जा रही हैं। पार्टी का दावा है कि इसका इस्तेमाल पात्र मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा सकता है।
कांग्रेस ने किच्छा विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि करीब 50 मतदान केंद्रों पर 10 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं के नाम हटाने को लेकर आपत्तियां दर्ज हुई हैं। पार्टी के अनुसार केवल चार लोगों ने 100 से अधिक आपत्तियां दाखिल कीं।
सबसे ज्यादा चर्चा राजेश तिवारी के नाम से करीब 6,410 आपत्तियां दर्ज होने के दावे को लेकर है।
कांग्रेस ने इन आपत्तियों की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा है कि किसी पात्र मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
पार्टी ने प्रपत्र-7, डीएसई और पीएसई से जुड़े मामलों में अंतिम रूप से नाम हटाने की कार्रवाई जांच पूरी होने तक रोकने की मांग भी की है।
इसके साथ ही कांग्रेस ने प्रपत्र-7 में दिए गए आवेदन, हस्ताक्षर, डिजिटल निशान, सीसीटीवी फुटेज और सत्यापन रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग रखी है।
अब निर्वाचन विभाग ने बढ़ाई निगरानी
कांग्रेस के सवालों के बीच निर्वाचन विभाग ने भी SIR की दावे-आपत्ति प्रक्रिया की निगरानी को लेकर कदम उठाया है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बीवीआरसी पुरुषोत्तम के निर्देश पर हरिद्वार, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जिलों के 22 विधानसभा क्षेत्रों में दावे और आपत्तियों के निस्तारण की निगरानी के लिए नौ आईएएस/पीसीएस अधिकारियों को पर्यवेक्षण अधिकारी नियुक्त किया गया है।
हरिद्वार जिले के लिए डॉ. संदीप तिवारी, ललित नारायण मिश्र, नन्द कुमार और गोपाल राम बिनवाल को जिम्मेदारी दी गई है।
नैनीताल जिले में संजय कुमार और ऊधमसिंह नगर में प्रकाश चन्द्र दुम्का, जय किशन, विनीत तोमर और दिवेश शाशनी को पर्यवेक्षण अधिकारी बनाया गया है।
इन अधिकारियों की जिम्मेदारी सिर्फ कागजों की निगरानी तक सीमित नहीं होगी। उन्हें संबंधित विधानसभा क्षेत्रों में नोटिस जारी करने, उसकी तामीली, सुनवाई और दावे-आपत्तियों के निस्तारण की प्रक्रिया पर नजर रखनी होगी।
साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि निर्वाचन आयोग की निर्धारित प्रक्रिया और नियमों का पालन करते हुए मामलों का गुणवत्तापूर्ण निस्तारण हो।
हफ्ते में दो बार देनी होगी रिपोर्ट
पर्यवेक्षण अधिकारियों को अपने क्षेत्र के निरीक्षण की रिपोर्ट सप्ताह में दो बार संबंधित मंडलायुक्त के माध्यम से मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय को भेजनी होगी।
इसके लिए निर्वाचन आयोग के Manual on Electoral Roll-2023 में निर्धारित पुनरीक्षण प्रक्रिया और रिपोर्टिंग प्रारूप का पालन किया जाएगा।
यानी निर्वाचन विभाग ने साफ तौर पर इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी को अब और व्यवस्थित करने की कोशिश की है।
असली सवाल अब जांच का है
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाना है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में आपत्तियां सामने आने के बाद सवाल यह है कि इनमें से कितनी वास्तविक हैं और कितनी आपत्तियां गलत या संदिग्ध तरीके से दर्ज की गई हैं?
कांग्रेस जिन मामलों का उदाहरण दे रही है, उनकी जांच से ही तस्वीर साफ होगी।
अगर किसी अपात्र व्यक्ति का नाम सूची में है तो उसे हटाना निर्वाचन प्रक्रिया की स्वाभाविक जरूरत है।
लेकिन दूसरी तरफ अगर कोई पात्र मतदाता है, तो केवल किसी आपत्ति के आधार पर उसका नाम हट जाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर विषय हो सकता है।
इसीलिए अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि हर आपत्ति की जांच रिकॉर्ड के आधार पर हो और संबंधित मतदाता को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिले।
राजनीतिक आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन मतदाता सूची का अंतिम सच दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा।
उत्तराखंड में SIR की यह प्रक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे उस सूची से जुड़ी है, जिसके आधार पर आने वाले चुनावों में नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे।
अब देखना होगा कि 1.07 लाख से अधिक आपत्तियों की इस बड़ी प्रक्रिया में निर्वाचन विभाग कितनी पारदर्शिता के साथ मामलों का निस्तारण करता है और जांच के बाद कितने नाम वास्तव में हटाए जाते हैं, कितने बरकरार रहते हैं और कितनी आपत्तियां गलत साबित होती हैं।
क्योंकि मतदाता सूची में एक गलत नाम रह जाना एक समस्या है, लेकिन एक सही मतदाता का नाम गलत तरीके से हट जाना भी उतनी ही गंभीर समस्या है।
