देहरादून में ‘कैप्टागन’ ड्रग फैक्ट्री का भंडाफोड़, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े तारों की जांच तेज
देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में प्रतिबंधित सिंथेटिक ड्रग ‘कैप्टागन’ के बड़े अवैध निर्माण का मामला सामने आने के बाद केंद्रीय एजेंसियां अलर्ट मोड में हैं। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने सहसपुर क्षेत्र स्थित एक फैक्ट्री पर छापा मारकर करीब दो लाख प्रतिबंधित टैबलेट बरामद की हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी कीमत करोड़ों रुपये आंकी जा रही है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, सहसपुर स्थित ‘ग्रीन हर्बल’ नामक फैक्ट्री में बिना किसी वैध लाइसेंस के प्रतिबंधित और नशीली दवाओं का निर्माण किया जा रहा था। कार्रवाई के दौरान फैक्ट्री संचालक संजय कुमार को गिरफ्तार कर दिल्ली ले जाया गया, जहां उससे कथित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और सप्लाई चेन को लेकर पूछताछ जारी है।
पश्चिम एशिया कनेक्शन की जांच
एनसीबी की शुरुआती जांच में सामने आया है कि बरामद ‘कैप्टागन’ ड्रग को पश्चिम एशियाई देशों तक पहुंचाने की तैयारी थी। ‘कैप्टागन’ को कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में तथाकथित “जिहादी ड्रग” के रूप में भी उल्लेखित किया गया है, क्योंकि अतीत में इसका उपयोग उग्रवादी संगठनों से जोड़ा जाता रहा है।
यह मामला उस समय और गंभीर हो गया जब दिल्ली और गुजरात के मुंद्रा पोर्ट से हाल ही में करीब 182 करोड़ रुपये मूल्य की कैप्टागन ड्रग बरामदगी के मामले में गिरफ्तार सीरियाई नागरिक अलब्रास अहमद से पूछताछ के दौरान देहरादून कनेक्शन सामने आया। जांच एजेंसियों का दावा है कि नवंबर 2025 में जब्त की गई बड़ी खेप का एक हिस्सा सहसपुर की इसी फैक्ट्री में तैयार किया गया था।
फैक्ट्री में मिली अत्याधुनिक मशीनें
एनसीबी की टीम ने 16 मई की रात फैक्ट्री में छापा मारा। छापेमारी के दौरान परिसर से अत्याधुनिक मशीनें, रसायन, कैप्सूल और पैकेजिंग सामग्री बरामद की गई। अधिकारियों के अनुसार, फैक्ट्री मालिक परिसर का उपयोग कैप्टागन टैबलेट निर्माण के लिए प्रतिदिन 50 हजार रुपये लेकर करने देता था।
जांच में यह भी सामने आया है कि इस पूरे ऑपरेशन में एक अन्य सीरियाई नागरिक की भी भूमिका हो सकती है। एजेंसियां अब विदेशी नागरिकों, मनी ट्रेल और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई नेटवर्क की गहन जांच कर रही हैं।
पहले भी विवादों में रही फैक्ट्री
ग्रीन हर्बल फैक्ट्री इससे पहले भी वर्ष 2024 में विवादों में आ चुकी है। उस समय सहसपुर पुलिस, एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स, विजिलेंस और ड्रग विभाग की संयुक्त कार्रवाई में यहां से ट्रामाडोल, बुप्रेनॉर्फिन, कोडीन युक्त सिरप और अन्य नियंत्रित दवाइयों का बड़ा जखीरा बरामद किया गया था। तब भी फैक्ट्री मालिक समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
जांच में सामने आया था कि फूड लाइसेंस की आड़ में नशीली और नियंत्रित दवाओं का अवैध निर्माण किया जा रहा था। जेल से बाहर आने के बाद दोबारा इसी तरह की गतिविधियों के सामने आने से एजेंसियां सतर्क हो गई हैं।
FDA ने कहा- रिकॉर्ड में नहीं थी इकाई
उत्तराखंड खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने भी इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया दी है। अपर आयुक्त ताजबर सिंह जग्गी ने कहा कि ‘ग्रीन हर्बल्स’ नाम की कोई इकाई विभाग के रिकॉर्ड में पंजीकृत नहीं थी। न ही उसे औषधि निर्माण का लाइसेंस जारी किया गया था और न ही एफएसएसएआई के तहत कोई अनुमति दी गई थी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि “कैप्टागन किसी वैध दवा की श्रेणी में नहीं आती, बल्कि यह एनडीपीएस एक्ट के तहत प्रतिबंधित पदार्थ है।”
उत्तराखंड में बढ़ता अवैध दवा नेटवर्क
पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड के देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर समेत कई क्षेत्रों में अवैध दवा निर्माण और नकली दवाओं के कारोबार के मामले लगातार सामने आए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 से 2026 के बीच 862 स्थानों पर छापेमारी की गई, जिसमें छह कंपनियों के लाइसेंस रद्द किए गए और कई गिरफ्तारियां हुईं।
वहीं ‘ड्रग फ्री उत्तराखंड’ अभियान के तहत पुलिस और एसटीएफ ने नशीली दवाओं और एनडीपीएस मामलों में बड़ी कार्रवाई करते हुए सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया है।
अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट की आशंका
एनसीबी और अन्य केंद्रीय एजेंसियों को आशंका है कि यह मामला केवल स्थानीय स्तर का नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट से जुड़ा हो सकता है। विदेशी नागरिकों की संलिप्तता और पश्चिम एशिया कनेक्शन सामने आने के बाद अब जांच एजेंसियां नेटवर्क के अन्य सदस्यों की तलाश में जुटी हैं।
