आज पाकिस्तानी संसद  की कार्यवाही पर देश-दुनिया की निगाहें टिकी हुई थीं। संसद में इमरान खान की सरकार के खिलाफ पेश अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान होना था। ऐसे में प्रधानमंत्री इमरान खान के आखिरी गेंद में डाले गए यॉर्कर से पाकिस्तान का पूरा विपक्ष क्लीन बोल्ड हो गया है। प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के खिलाफ वोटिंग से पहले ही नेशनल असेंबली के डिप्टी स्पीकर क़ासिम सूरी ने अविश्वास प्रस्ताव को असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया है। ऐसा पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 58 (1) और 48 (1) के तहत किया गया है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति के कार्यालय से जारी बयान में कहा गया है, “पाकिस्तान के राष्ट्रपति डॉ आरिफ अल्वी ने प्रधानमंत्री इमरान खान के नेशनल असेंबली भंग करने की सलाह को मंज़ूरी दे दी है। बता दें कि पाकिस्तन का कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है और अब  पीएम इमरान खान भी इस लंबी सूची में शामिल हो गए हैं।

विपक्ष एकजुट था और साथ ही इमरान के पार्टी के कई सांसद भी उनके खिलाफ थे और इन सबके बीच नेशनल असेंबली में उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की योजना थी। अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान होना थाअगर इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता तो वोटिंग होती।
पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली में 342 सदस्यों की ताकत है, जिसमें बहुमत का निशान 172 था। स्‍पीकर ने न केवल विपक्ष के अविश्‍वास प्रस्‍ताव को खारिज कर दिया बल्कि इमरान खान ने संसद को भंग करने की सिफारिश कर दी जिसे राष्‍ट्रपति ने स्‍वीकार कर लिया है।
गौरतलब है कि पकिस्तान के 75 साल के इतिहास में पाकिस्तान का एक भी प्रधानमंत्री अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका है। आर्मी और पाकिस्तान से जो सियासी संकेत मिल रहे थे उन सबके बीच यह माना जा रहा था कि इमरान खान बतौर पीएम सबसे मुश्किल दौर में थे।
कहानी सिर्फ इमरान खान तक ही सीमित नहीं है ऐसा पाकिस्तान के इतिहास में हमेशा से रहा है कि कोई भी प्रधानमंत्री लगातार पांच साल तक कुर्सी पर पाया। लियाकत अली खान, पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री थे। मुस्लिम लीग से आने वाले लियाकत अली खान की अक्टूबर 1951 में गोली मारकर हत्या कर दी जाती है। उनकी हत्या के बाद ख्वाजा नाजीमुद्दीन ने सत्ता संभाली। बमुश्किल दो साल ही इस कुर्सी पर थे तब तक गवर्नर जनरल ने उन्हें पद से हटा दिया। 1953 तक वो इस पद पर रहे। उनके बाद मोहम्मद अली बोगला कुर्सी पर आए लेकिन वो भी कुछ महीनों के ही मेहमान रहे।
1955 में चौधरी मुहम्मद अली ने प्रधानमंत्री का पद संभाला लेकिन एक साल बाद ही राष्ट्रपति चुनाव के विवाद में इस्तीफा दे दिया। 1956 में शाहिद सुहरावर्दी पीएम बने लेकिन दो साल के भीतर ही पद छोड़ना पड़ा। 1957 में इस्माइल चुंद्रीगर प्रधानमंत्री बने लेकिन 2 महीने के भीतर ही पद छोड़ना पड़ा। 1957 में ही फिरोज खान नए पीएम बने लेकिन अगले साल 1958 में मार्शल लॉ लागू होने के बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। 1958 से 1969 तक अयूब खान पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे और देश को चलाया।
1970 में पाकिस्तान में आम चुनाव हुए और नुरुल अमिन पाकिस्तान के पीएम बने। यह साल भी पाकिस्तान के इतिहास में दर्ज है और 13 दिन बाद भी पाकिस्तान में फिर सैन्य राज की शुरुआत हो जाती है। 1973 तक फिर ऐसे ही चला उसके बाद जुल्फिकार अली भुट्टो राष्ट्रपति का पद छोड़कर पीएम बने। 1977 में एक बार फिर पाक में आर्मी का शासन आ गया और यह 1985 तक चला। 85 में जब आम चुनाव हुए तब मोहम्मद खान जुनेजा पीएम चुने गए।1988 में जुनेजा को पद से हटा दिया गया।
1988 में बेनजीर भुट्टो पीएम बनीं। वह पाकिस्तान की पहली महिला पीएम थीं। वह दो साल तक गद्दी पर रहीं जब 1990 में चुनाव हुए तो उनकी पार्टी चुनाव हार गई और नवाज शरीफ पीएम चुने गए। लेकिन 1993 में पद छोड़ना पड़ा। 97 में दोबारा पीएम बने और 99 तक प्रधानमंत्री रहे लेकिन अक्टूबर 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाते हुए देश में इमरजेंसी लगा दी। जनरल परवेज मुशर्रफ के शासन में तीन प्रधानमंत्री मीर जफरुल्लाह खान जमाली, चौधरी शुजात और शौकत अजीज रहे।
साल 2008 के आम चुनाव में पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) ने नेशनल असेंबली में बहुमत हासिल किया और यूसुफ रजा गिलानी को प्रधानमंत्री बनाया गया। हालांकि, साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट में अदालत की अवमानना के एक मामले में यूसुफ रजा गिलानी को दोषी ठहराया गया। इसके बाद प्रधानमंत्री के पद पर उनकी जगह बाकी का कार्यकाल राजा परवेज अशरफ ने पूरा किया।
2013 में तीसरी बार नवाज शरीफ ने पाकिस्तान में प्रधानमंत्री का पदभार संभाला लेकिन 2017 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कुर्सी चली गई। इमरान खान ने 18 अगस्त, 2018 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी।