उत्तराखंड में बढ़ते तापमान से भड़की वनाग्नि, गढ़वाल के कई वन प्रभागों में बढ़ीं आग की घटनाएं
देहरादून। उत्तराखंड में इस बार शुरुआती महीनों में नियंत्रित दिखाई दे रही वनाग्नि अब बढ़ते तापमान के साथ चिंता का विषय बनती जा रही है। मई के अंतिम सप्ताह में तापमान में तेजी से हुई बढ़ोतरी के बाद गढ़वाल मंडल के कई वन क्षेत्रों में आग की घटनाओं में अचानक इजाफा हुआ है, जिससे वन विभाग और प्रशासन अलर्ट मोड में आ गए हैं।
प्रदेश में हर वर्ष 15 फरवरी से 30 जून अथवा मानसून आने तक फॉरेस्ट फायर सीजन माना जाता है। इस दौरान गर्मी बढ़ने के साथ जंगलों में आग लगने की घटनाएं आम हो जाती हैं। इस बार भी वन विभाग और विशेषज्ञों ने पहले ही अधिक तापमान के कारण वनाग्नि की घटनाएं बढ़ने की आशंका जताई थी। हालांकि फरवरी से अप्रैल तक हालात अपेक्षाकृत नियंत्रण में रहे और आग की घटनाएं पिछले वर्ष की तुलना में कम दर्ज की गईं, जिससे विभाग ने राहत की सांस ली थी।
लेकिन मई के अंतिम सप्ताह में मौसम के बदले मिजाज ने स्थिति बदल दी। तेज गर्मी और सूखे जंगलों के कारण आग की घटनाओं में तेजी आने लगी है।
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार 15 फरवरी से 21 मई तक प्रदेश में वनाग्नि की कुल 337 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें करीब 283 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। इनमें सबसे अधिक मामले गढ़वाल मंडल से सामने आए हैं।
यदि पिछले पांच से छह दिनों के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस अवधि में 54 वनाग्नि की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें लगभग 55 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि तापमान बढ़ने के साथ जंगलों में आग फैलने का खतरा भी बढ़ रहा है।
गढ़वाल के कई वन प्रभाग सबसे अधिक प्रभावित
वन विभाग के अनुसार Tehri Garhwal वन प्रभाग, अलकनंदा भूमि संरक्षण वन प्रभाग गोपेश्वर, गढ़वाल वन प्रभाग, नरेंद्र नगर वन प्रभाग, सोयल कंजर्वेशन कालसी और Kedarnath वाइल्ड लाइफ डिवीजन में आग की घटनाएं अधिक दर्ज की गई हैं। इसके अलावा Badrinath डिवीजन में भी आग लगने की घटनाएं सामने आई हैं।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जंगलों में सूखी पत्तियों की अधिकता और लगातार बढ़ते तापमान के कारण आग तेजी से फैल रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में कहीं-कहीं हल्की बूंदाबांदी हो रही है, लेकिन तेज हवाओं के चलते उसका विशेष असर दिखाई नहीं दे रहा। हवाएं आग को एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैलाने में मदद कर रही हैं।
विभाग और प्रशासन अलर्ट मोड में
वन विभाग ने सभी अधिकारियों और फील्ड स्टाफ को हाई अलर्ट पर रहने के निर्देश दिए हैं। विशेष रूप से रिस्पांस टाइम को लेकर गंभीरता बरती जा रही है, ताकि आग लगने की सूचना मिलते ही टीम तत्काल मौके पर पहुंच सके।
विभाग की ओर से निर्देश दिए गए हैं कि किसी भी वनाग्नि की घटना की सूचना तुरंत जिला प्रशासन, एसडीआरएफ, फायर सर्विस और संबंधित विभागों को भी दी जाए, ताकि समन्वय के साथ जल्द आग पर काबू पाया जा सके।
पर्यावरण और वन्यजीवों पर बढ़ता खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार जंगलों में बढ़ती आग केवल वन संपदा को नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि इसका असर पर्यावरण, जैव विविधता और जल स्रोतों पर भी पड़ता है। वनाग्नि से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है, छोटे पौधे और प्राकृतिक वनस्पतियां नष्ट हो जाती हैं तथा वन्यजीवों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में बड़ी आबादी की आजीविका और जल स्रोत जंगलों पर निर्भर हैं। ऐसे में वनाग्नि की बढ़ती घटनाएं गंभीर चिंता का विषय बन गई हैं।
वन विभाग ने संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी है। फायर वॉचर और फील्ड स्टाफ को सक्रिय रखा गया है तथा कंट्रोल रूम से लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। विभाग ने स्थानीय लोगों से भी अपील की है कि जंगलों के आसपास आग का प्रयोग सावधानी से करें और किसी भी आग की घटना की सूचना तुरंत विभाग को दें।
